योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ 5.24 ॥
जो पुरुष अंतरात्मा में ही सुख वाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है और जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह ब्रह्मरूप हुआ योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त होता है।
विस्तार: जो इंसान खुद के साथ वक्त बिताना सीख लेता है, उसे बाहर की भीड़ की जरूरत नहीं पड़ती। जब आपका [Your Dream] आपका 'आंतरिक सुख' बन जाता है, तो फिर पढ़ाई करना आपके लिए एक एकांत साधना की तरह आनंदमय हो जाता है।