स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ 27 ॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ 28 ॥
बाहर के विषयों को बाहर ही निकालकर, नेत्रों की दृष्टि को भौंहों के बीच में स्थित करके और नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को समान करके; जिसकी इंद्रियाँ, मन और बुद्धि जीती हुई हैं, वह मोक्षपरायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से रहित होकर सदा के लिए मुक्त ही है।
विस्तार: यहाँ कृष्ण ध्यान (Meditation) का पहला लेसन दे रहे हैं। पढ़ाई शुरू करने से पहले 5 मिनट इस तरह बैठना आपके 'Focus' को सुपरपावर बना सकता है। जब आप सांसों पर नियंत्रण (Pranayama) करते हैं, तो दिमाग का फालतू भटकना बंद हो जाता है।