॥ अध्याय 5, श्लोक 29 ॥

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्ति मृच्छति ॥ 5.29 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला, संपूर्ण लोकों का ईश्वरों का भी ईश्वर और संपूर्ण भूत-प्राणियों का परम मित्र (सुहृद) जानकर मनुष्य शांति को प्राप्त होता है।

विस्तार: इस श्लोक में कृष्ण कहते हैं कि वे हमारे 'सबसे अच्छे मित्र' हैं। जब आप यह जान लेते हैं कि पूरी कायनात और परमात्मा आपके साथ एक मित्र की तरह खड़े हैं, तो [Your Dream] के लिए लड़ते हुए आप कभी अकेलापन महसूस नहीं करते। यह विश्वास ही 'परम शांति' है।

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