॥ अध्याय 5, श्लोक 3 ॥

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ 5.3 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

हे महाबाहो! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी 'नित्य संन्यासी' ही समझने योग्य है; क्योंकि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है।

विस्तार: संन्यासी होने के लिए घर छोड़ना जरूरी नहीं। यदि आप पढ़ाई करते हुए न तो किसी से जलते हैं और न ही परिणाम की अति-चिंता करते हैं, तो आप घर बैठे ही संन्यासी हैं। [Your Dream] के सफर में 'द्वंद्व' (सफलता का डर और असफलता की घृणा) को छोड़ना ही आपकी सबसे बड़ी जीत है।

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