शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ 11 ॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ 12 ॥
शुद्ध स्थान पर, न बहुत ऊँचा और न बहुत नीचा, कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछाकर अपना स्थिर आसन लगाएं। उस पर बैठकर, मन को एकाग्र करके और इंद्रियों की क्रियाओं को रोककर अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करें।
विस्तार: कृष्ण यहाँ 'Environment Design' की बात कर रहे हैं। आपकी पढ़ाई की मेज साफ और व्यवस्थित होनी चाहिए। एक स्थिर मुद्रा (Posture) आपके दिमाग को सिग्नल देती है कि अब 'एकाग्र' होने का समय है।