यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ 6.18 ॥
जिस काल में अत्यंत वश में किया हुआ चित्त केवल आत्मा में ही स्थित हो जाता है और संपूर्ण कामनाओं से रहित हो जाता है, उस काल में वह 'युक्त' (योगी) कहलाता है।
विस्तार: जब आप पढ़ रहे हों और आपके मन में खाने, मोबाइल चलाने या बाहर घूमने की कोई इच्छा न हो, केवल वही 'Topic' हो जिसे आप पढ़ रहे हैं—तो समझिये आप उस पल के लिए 'युक्त' हो गए हैं।