यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ 6.2 ॥
हे पाण्डव! जिसे संन्यास कहते हैं, उसे ही तू योग जान; क्योंकि संकल्पों (इच्छाओं) का त्याग किए बिना कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।
विस्तार: यहाँ संकल्प का अर्थ है 'फलों की कामना'। जब तक मन में अगर नहीं हुआ तो? या लोग क्या कहेंगे? जैसे संकल्प चलते रहेंगे, तब तक एकाग्रता नहीं आएगी। इन संकल्पों को छोड़कर केवल काम में जुटना ही योग है।