यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया... (20)
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्... (21)
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः... (22)
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्... (23)
जिस अवस्था में योग के अभ्यास से चित्त शांत हो जाता है, जहाँ वह केवल बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य 'अतीन्द्रिय सुख' (Indriya-atit) को प्राप्त करता है, जिसे पाकर वह बड़े से बड़े दुख (जैसे विफलता या हानि) से भी विचलित नहीं होता; 'दुख-रूप संसार के संयोग के वियोग' का नाम ही 'योग' है।
विस्तार: कृष्ण यहाँ एक ऐसी मानसिक शक्ति की बात कर रहे हैं, जहाँ आप अपनी पढ़ाई में इतना आनंद लेने लगते हैं कि आपको बाहरी इनामों की जरूरत नहीं पड़ती। जब आप इस स्तर पर पहुँचते हैं, तो बड़ी से बड़ी कठिनाई भी आपको तोड़ नहीं सकती।