प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्... (27)
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः... (28)
जिसका मन शांत है, जो रजोगुण से रहित है, ऐसे निष्पाप योगी को उत्तम आनंद (सुख) प्राप्त होता है। वह सदा आत्मा को परमात्मा में लगाते हुए बड़ी सहजता से असीम सुख का अनुभव करता है।
विस्तार: जब आप फालतू की इच्छाओं और ईर्ष्या (रजोगुण) से मुक्त होकर पढ़ते हैं, तो वह पढ़ाई बोझ नहीं, 'उत्तम सुख' बन जाती है।