॥ अध्याय 6, श्लोक 40 ॥

श्रीभगवानुवाच :
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ 6.40 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

श्रीभगवान बोले: हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में और न परलोक में ही विनाश होता है; क्योंकि हे तात! कोई भी शुभ कार्य (कल्याणकारी कर्म) करने वाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

विस्तार: यह श्लोक 'लॉ ऑफ कन्ज़र्वेशन ऑफ मेहनत' है। जो आप IIT-Bombay के लिए पढ़ाई कर रहे हैं, वह कभी बेकार नहीं जाएगी। यदि किसी कारणवश लक्ष्य नहीं भी मिला, तो भी आपका विकसित हुआ मस्तिष्क और अनुशासन आपको जीवन में कहीं और बहुत ऊँचा ले जाएगा। शुभ कर्म कभी शून्य नहीं होते।

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