॥ अध्याय 6, श्लोक 41-42 ॥

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ 41 ॥
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ 42 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

योगभ्रष्ट पुरुष (जो मार्ग से भटक गया) पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर और वहाँ बहुत वर्षों तक रहकर, फिर शुद्ध आचरण वाले धनवानों के घर में जन्म लेता है। अथवा वह बुद्धिमान योगियों के कुल में ही जन्म लेता है। इस प्रकार का जन्म संसार में अत्यंत दुर्लभ है।

विस्तार: कृष्ण समझा रहे हैं कि आपकी मेहनत आपके 'DNA' या संस्कारों में दर्ज हो जाती है। अगले जीवन (या अगले अवसर) में आप शून्य से शुरुआत नहीं करते, बल्कि वहीं से शुरू करते हैं जहाँ आपने छोड़ा था। इसीलिए कुछ बच्चे बचपन से ही बहुत तेज और एकाग्र होते हैं।

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