॥ अध्याय 6, श्लोक 43-44 ॥

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ 43 ॥
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ 44 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

वहाँ वह पहले शरीर में संचित किए हुए बुद्धि के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त कर लेता है और उसके प्रभाव से वह फिर सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है। वह पिछला अभ्यास उसे विवश होकर भी (अपनी ओर) खींचता है।

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