तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ 6.46 ॥
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन! तू योगी बन।
विस्तार: कृष्ण कह रहे हैं कि केवल शरीर को कष्ट देना (तप), केवल जानकारी इकट्ठा करना (ज्ञान), या केवल लालच में काम करना (सकाम कर्म) काफी नहीं है। 'योगी' वह है जो मन को संतुलित रखकर कर्म करता है। एक विद्यार्थी के रूप में आपको केवल रटना नहीं है, बल्कि 'योगी' की तरह एकाग्रता से पढ़ना है।