बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ 7.11 ॥
कृष्ण कहते हैं: हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल हूँ, और प्राणियों में धर्म के अनुकूल (शास्त्रसम्मत) काम (इच्छा) हूँ।
आध्यात्मिक मर्म: यहाँ भगवान बहुत बड़ी बात कह रहे हैं। बल वह श्रेष्ठ है जो दूसरों की रक्षा के लिए हो (काम-राग से रहित), न कि अहंकार के लिए। साथ ही, इच्छाएं बुरी नहीं हैं, यदि वे धर्म के दायरे में हों—जैसे संतान की इच्छा, ज्ञान की इच्छा, या लोक-कल्याण की इच्छा। कृष्ण ऐसी पवित्र इच्छाओं के रूप में स्वयं उपस्थित हैं।