ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ 7.12 ॥
कृष्ण कहते हैं: जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, उन सबको तू मुझसे ही होने वाला जान। परंतु वास्तव में उनमें मैं नहीं हूँ और वे मुझमें हैं।
आध्यात्मिक मर्म: जैसे एक सिनेमा की स्क्रीन पर दिखने वाले सभी दृश्य (सुखद, हिंसक या शांत) बिजली और प्रोजेक्टर से पैदा होते हैं, लेकिन स्क्रीन उन दृश्यों से गीली या जलती नहीं है। वैसे ही, प्रकृति के तीनों गुण भगवान से पैदा होते हैं, पर भगवान उनसे अछूते (निर्लिप्त) रहते हैं।