कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ 7.20 ॥
कृष्ण कहते हैं: अपनी-अपनी प्रकृति (स्वभाव) के कारण जिनकी बुद्धि कामनाओं द्वारा हर ली गई है, वे लोग उन-उन नियमों का पालन करते हुए अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं।
आध्यात्मिक मर्म: जब इंसान की इच्छाएं (जैसे पद, धन, शत्रु नाश) प्रबल हो जाती हैं, तो वह 'शॉर्टकट' खोजने लगता है। वह भूल जाता है कि सब कुछ देने वाला एक ही है, और वह अलग-अलग शक्तियों की पूजा में उलझ जाता है।