॥ अध्याय 7, श्लोक 22-23 ॥

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते... (22)
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्... (23)

व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: वह भक्त उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की पूजा करता है और उन देवताओं से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए इच्छित भोगों को प्राप्त करता है। परंतु उन अल्प-बुद्धि वालों का वह फल नाशवान है। देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं।

आध्यात्मिक मर्म: अन्य शक्तियों से मिलने वाले भौतिक सुख (जैसे धन, यश) अस्थायी हैं और एक दिन खत्म हो जाएंगे। कृष्ण सलाह देते हैं कि जब मेहनत उतनी ही करनी है, तो 'अविनाशी' परमात्मा को क्यों न मांगा जाए?

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