॥ अध्याय 7, श्लोक 25 ॥

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ 7.25 ॥

व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: अपनी योगमाया से ढका हुआ मैं सबके लिए प्रत्यक्ष नहीं होता। यह अज्ञानी संसार मुझ अजन्मे और अविनाशी को नहीं पहचान पाता।

आध्यात्मिक मर्म: जैसे बादलों के पीछे सूर्य छिपा रहता है, वैसे ही संसार की मोह-माया के पीछे ईश्वर छिपे हैं। जब तक हमारे भीतर अहंकार और अज्ञान है, हम उस दिव्य प्रकाश को नहीं देख सकते।

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