इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ 7.27 ॥
कृष्ण कहते हैं: हे भरतवंशी अर्जुन! इच्छा और द्वेष (राग-द्वेष) से उत्पन्न होने वाले सुख-दुखादि द्वंद्वों के मोह से इस संसार के सभी प्राणी अत्यंत अज्ञान (सम्मोह) को प्राप्त हो रहे हैं।
आध्यात्मिक मर्म: हम हमेशा यह मुझे चाहिए (इच्छा) और यह मुझे नहीं चाहिए (द्वेष) के बीच झूलते रहते हैं। यही पसंद-नापसंद का चश्मा हमें परमात्मा का दर्शन नहीं करने देता। जब तक मन इन दो किनारों से टकराता रहेगा, वह शांत होकर सत्य को नहीं देख पाएगा।