॥ भगवद्गीता: अध्याय 7, श्लोक 3 ॥
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ 7.3 ॥
सरल भावार्थ
हजारों मनुष्यों में से कोई एक परम लक्ष्य (सिद्धि) की प्राप्ति के लिए प्रयास करता है, और उन प्रयास करने वाले साधकों में से भी शायद ही कोई एक मुझे वास्तव में (जैसे मैं हूँ) जान पाता है।
नया उदाहरण (वैज्ञानिक दृष्टिकोण):
कल्पना कीजिए कि दुनिया में करोड़ों लोग संगीत सुनते हैं। उनमें से कुछ हजार संगीत सीखने का प्रयास करते हैं। उन हजारों में से कुछ ही 'सिम्फनी' (Symphony) की जटिलताओं और उसके पीछे के गणित को समझ पाते हैं। लेकिन उन कुछ गिने-चुने लोगों में से भी शायद ही कोई एक ऐसा 'बेथोवेन' या 'मोजार्ट' बनता है जो संगीत की आत्मा से एक हो जाता है।
यही बात महान खोजों पर लागू होती है—हजारों लोग अंतरिक्ष को देखते हैं, कुछ उसे समझने का यत्न करते हैं, लेकिन कोई एक 'आइंस्टीन' ही गुरुत्वाकर्षण के वास्तविक 'तत्व' (Essence) को पकड़ पाता है।
गहरी अंतर्दृष्टि (Insight)
कृष्ण यहाँ 'Selection Process' की बात कर रहे हैं। सत्य (Truth) सबके लिए उपलब्ध है, लेकिन उसे पाने की प्यास बहुत कम लोगों में होती है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि भीड़ का हिस्सा होना आसान है, लेकिन 'तत्व' तक पहुँचने के लिए असाधारण धैर्य और समर्पण की आवश्यकता होती है।
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