जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चानिखलम् ॥ 29 ॥
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ 30 ॥
कृष्ण कहते हैं: जो मेरे आश्रित होकर जन्म और मृत्यु से छूटने के लिए यत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म को, संपूर्ण अध्यात्म को और संपूर्ण कर्म को जानते हैं। जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के साथ जानते हैं, वे युक्त चित्त वाले पुरुष अंत समय (मृत्यु) में भी मुझे ही जानते हैं।
[Image: A peaceful yogi leaving the body, with the mind focused on the divine light, transcending the physical world]आध्यात्मिक मर्म: यह अध्याय एक पहेली के साथ समाप्त होता है। कृष्ण यहाँ कुछ तकनीकी शब्द (ब्रह्म, अध्यात्म, अधिभूत आदि) इस्तेमाल कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जो मुझे पूरी तरह समझ लेता है, उसे मृत्यु का डर नहीं रहता, क्योंकि वह जानता है कि वह कभी मरता ही नहीं।