॥ अध्याय 7, श्लोक 5 ॥

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ 7.5 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

यह (आठ तत्वों वाली) तो मेरी 'अपरा' (निचली) प्रकृति है। लेकिन हे महाबाहो! इससे दूसरी मेरी 'परा' (उच्च) प्रकृति को जान, जो 'जीव-रूपा' है और जिसके द्वारा यह संपूर्ण जगत् धारण किया जाता है।

विस्तार: पिछले श्लोक में 'हार्डवेयर' की बात थी, यहाँ 'सॉफ्टवेयर' या चेतना (Consciousness) की बात है। जैसे बिना बिजली के मशीन बेकार है, वैसे ही बिना इस 'परा प्रकृति' (प्राण शक्ति) के भौतिक शरीर निर्जीव है। यही वह शक्ति है जो सौरमंडल से लेकर हमारे शरीर की कोशिकाओं तक को चला रही है।

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