॥ अध्याय 7, श्लोक 7 ॥

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ 7.7 ॥

भावार्थ (Hindi Explanation)

हे धनञ्जय! मुझसे श्रेष्ठ दूसरा कोई भी कारण नहीं है। यह संपूर्ण जगत् मुझमें वैसे ही गुंथा हुआ है, जैसे सूत्र (धागे) में मणियां पिरोई होती हैं।

[Image: A beautiful pearl necklace where the thread is invisible but holds every single pearl in place]

विस्तार: यह एक बहुत शक्तिशाली उदाहरण है। मणियां (ग्रह, तारे, जीव) हमें दिखाई देती हैं, लेकिन जो धागा (परमात्मा/ऊर्जा) उन्हें जोड़कर रखे हुए है, वह अदृश्य है। यदि धागा टूट जाए, तो मणियां बिखर जाएंगी। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम सब एक ही 'Universal Energy' से जुड़े हुए हैं।

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