रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ 7.8 ॥
कृष्ण कहते हैं: हे कुन्तीपुत्र! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, समस्त वेदों में ॐकार (प्रणव) हूँ, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषार्थ हूँ।
आध्यात्मिक मर्म: जब आप प्यासे होते हैं और जल पीते हैं, तो वह जो तृप्ति और स्वाद मिलता है, वह साक्षात कृष्ण का स्वरूप है। सूर्य की रोशनी उनकी चमक है। वेदों का सार 'ॐ' है, जो सृष्टि की पहली ध्वनि है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि पूजा केवल मंदिर में नहीं, बल्कि प्रकृति के हर कण के अनुभव में है।