यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ 8.11 ॥
कृष्ण कहते हैं: वेद के ज्ञाता जिसे अक्षर (अविनाशी) कहते हैं, वीतरागी (आसक्तिहीन) सन्यासी जिसमें प्रवेश करते हैं और जिसकी इच्छा करने वाले ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं—उस पद को मैं संक्षेप में कहूँगा।
आध्यात्मिक मर्म: यहाँ उस 'परम लक्ष्य' की महिमा बताई गई है जिसके लिए ऋषि-मुनि कठोर तपस्या और अनुशासन का पालन करते हैं। वह लक्ष्य है—अविनाशी सत्ता के साथ एक हो जाना।