अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ 8.14 ॥
कृष्ण कहते हैं: हे पार्थ! जो पुरुष मुझमें अनन्य चित्त होकर सदा ही निरंतर मेरा स्मरण करता है, उस नित्य मुझमें लगे हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ (आसानी से प्राप्त हो जाता हूँ)।
आध्यात्मिक मर्म: पिछले श्लोकों में बताई गई योग-विधि कठिन हो सकती है, लेकिन कृष्ण यहाँ आश्वासन दे रहे हैं कि 'निरंतर प्रेमपूर्ण स्मरण' ही सबसे सरल योग है। जो हर पल ईश्वर को अपने साथ महसूस करता है, उसे ईश्वर को खोजने कहीं जाना नहीं पड़ता; ईश्वर खुद उसके पास सुलभ हो जाते हैं।