॥ अध्याय 8, श्लोक 15-16 ॥

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ 15 ॥
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ 16 ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: परम सिद्धि को प्राप्त हुए महात्माजन मुझको प्राप्त होकर, दुखों के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते। ब्रह्मलोक तक के सभी लोक पुनरावर्ती (जहाँ से वापस लौटना पड़ता है) हैं, परंतु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।

आध्यात्मिक मर्म: यह संसार 'दुःखालय' (दुखों का घर) है। स्वर्ग या ब्रह्मलोक जाने पर भी पुण्य खत्म होने पर वापस आना पड़ता है। केवल परमात्मा का 'धाम' ही ऐसी जगह है जहाँ से आत्मा हमेशा के लिए मुक्त हो जाती है।

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