॥ अध्याय 8, श्लोक 18-19 ॥

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ 18 ॥
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ 19 ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: ब्रह्मा के दिन के आगमन पर संपूर्ण दृश्य जगत 'अव्यक्त' से प्रकट होता है और रात्रि के आने पर उसी 'अव्यक्त' में विलीन हो जाता है। वही यह भूत-समुदाय बार-बार पैदा होकर रात्रि के आने पर विवश होकर लीन हो जाता है और दिन के आने पर फिर से प्रकट होता है।

आध्यात्मिक मर्म: सृष्टि का आना-जाना प्राकृतिक है। जैसे हम रात को सोते समय सपनों की दुनिया से हटकर गहरी नींद (अव्यक्त) में चले जाते हैं और सुबह उठते ही संसार फिर सामने आ जाता है, वैसे ही यह ब्रह्मांड भी चक्रों में चलता है। हम सब इस चक्र में 'विवश' होकर घूम रहे हैं जब तक कि हम ईश्वर को प्राप्त न कर लें।

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