पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ 8.22 ॥
कृष्ण कहते हैं: हे पार्थ! जिसके अंतर्गत सभी प्राणी स्थित हैं और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, वह परम पुरुष तो केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है।
आध्यात्मिक मर्म: वह परमात्मा कहीं बाहर नहीं है, हम सब उसी के भीतर 'तैर' रहे हैं। उसे पाने के लिए किसी कठिन तकनीक की नहीं, बल्कि 'अनन्य भक्ति' (ऐसी प्रीति जिसमें भगवान के सिवा कोई दूसरा प्रिय न हो) की आवश्यकता है।