यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः... (23)
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ 24 ॥
कृष्ण कहते हैं: हे अर्जुन! अब मैं तुझे उन मार्गों के विषय में बताऊँगा जिनसे शरीर छोड़कर जाने वाले योगी वापस नहीं लौटते (मोक्ष) या वापस लौटते हैं। जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि, दिन का प्रकाश, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छह महीने होते हैं—उस मार्ग से जाने वाले ब्रह्मवेत्ता पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
[Image illustrating the Devayana (Path of Gods/Light) vs Pitriyana (Path of Fathers/Darkness) based on Upanishadic descriptions]आध्यात्मिक मर्म: ये श्लोक प्रतीकात्मक भी हैं और योगिक सत्य भी। 'अग्नि' और 'प्रकाश' ज्ञान के प्रतीक हैं। जो साधक ज्ञान की जाग्रत अवस्था में शरीर छोड़ता है, वह उस दिव्य मार्ग (देवयान मार्ग) पर बढ़ जाता है जहाँ से संसार में वापसी नहीं होती।