धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ 8.25 ॥
कृष्ण कहते हैं: जिस मार्ग में धुआँ, रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छह महीने होते हैं—उस मार्ग से जाने वाला सकाम कर्म करने वाला योगी चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर वापस लौट आता है।
आध्यात्मिक मर्म: यह 'पितृयान मार्ग' है। जो लोग पुण्य तो करते हैं लेकिन उनके मन में अभी भी सांसारिक इच्छाएं बची होती हैं, वे स्वर्ग के सुख भोगने के बाद दोबारा पृथ्वी पर जन्म लेते हैं। 'धुआँ' और 'रात्रि' अज्ञान और मोह के प्रतीक हैं।