नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ 8.27 ॥
कृष्ण कहते हैं: हे पार्थ! इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी कभी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय में योग से युक्त हो जा।
आध्यात्मिक मर्म: यहाँ कृष्ण रहस्य खोलते हैं—जरूरी यह नहीं कि आप किस दिन या किस महीने में मरते हैं, जरूरी यह है कि क्या आप 'योग' (परमात्मा से जुड़ाव) में स्थित हैं। जो योगी है, वह जानता है कि वह कहाँ जा रहा है, इसलिए उसे मृत्यु का भय या मार्गों का भ्रम नहीं होता।