वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ 8.28 ॥
कृष्ण कहते हैं: योगी पुरुष इस रहस्य को जानकर वेदों के पढ़ने में, यज्ञ, तप और दान आदि के करने में जो पुण्यफल कहा गया है, उन सबको पार कर जाता है और सनातन परम पद को प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक मर्म: भक्ति और योग का फल सभी कर्मकांडों से ऊपर है। जैसे IIT-Bombay पहुँचने का लक्ष्य रखने वाला विद्यार्थी छोटी-मोटी उपलब्धियों में नहीं रुकता, वैसे ही योगी का लक्ष्य सीधा 'परम धाम' होता है। उसे अलग से पुण्य बटोरने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि कृष्ण-भक्ति में सब कुछ समाहित है।