श्रीभगवानुवाच :
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ 8.3 ॥
श्रीभगवान बोले: परम अविनाशी तत्व ब्रह्म है; अपना स्वरूप (जीवात्मा) ही अध्यात्म कहा जाता है; तथा प्राणियों की उत्पत्ति और वृद्धि करने वाला त्याग (यज्ञ) कर्म नाम से कहा गया है।
आध्यात्मिक मर्म: 1. ब्रह्म: वह जो कभी नष्ट नहीं होता। 2. अध्यात्म: शरीर के भीतर स्थित हमारी अपनी चेतना। 3. कर्म: वह शक्ति जिससे सृष्टि का सृजन और विकास होता है।