॥ अध्याय 8, श्लोक 6 ॥

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ 8.6 ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अंत समय में जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह सदा उसी भाव को प्राप्त होता है।

आध्यात्मिक मर्म: यह प्रकृति का मनोवैज्ञानिक नियम है। यदि कोई मरते समय अपने धन, बच्चों या किसी अधूरी इच्छा के बारे में सोच रहा है, तो उसकी आत्मा उन्हीं परिस्थितियों की ओर खिंची चली जाती है। इसीलिए जीवन भर अभ्यास (अभ्यास योग) जरूरी है ताकि अंत में मन सही दिशा में रहे।

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