तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥ 8.7 ॥
कृष्ण कहते हैं: इसलिए तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मुझमें अर्पित मन-बुद्धि वाला होकर तू निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होगा।
आध्यात्मिक मर्म: यह श्लोक 'कर्मयोग' का सार है। भगवान यह नहीं कह रहे कि माला लेकर बैठ जाओ और अपना काम छोड़ दो। वे कह रहे हैं कि कर्तव्य (युद्ध/पढ़ाई/काम) करो, लेकिन मन के एक कोने में सदा मेरी स्मृति बनाए रखो। जैसे एक मां घर के सारे काम करती है, लेकिन उसका ध्यान हमेशा अपने छोटे बच्चे की ओर रहता है।