अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥ 8.8 ॥
कृष्ण कहते हैं: हे पार्थ! यह नियम है कि अभ्यास योग में लगे हुए, अन्यत्र न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम दिव्य पुरुष (परमात्मा) को ही प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक मर्म: अभ्यास (Practice) ही कुंजी है। यदि हम हर दिन थोड़ा समय ध्यान और ईश्वर के स्मरण में बिताते हैं, तो हमारा मन 'ट्रेन' हो जाता है। फिर मुश्किल समय या मृत्यु के समय वह यहाँ-वहाँ नहीं भटकता और सीधे दिव्य प्रकाश की ओर बढ़ जाता है।