कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः... (9)
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव... (10)
कृष्ण कहते हैं: जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धाता (धारण-पोषण करने वाले), अचिन्त्य स्वरूप, सूर्य के समान प्रकाशमान और अविद्या से परे उस परम पुरुष का स्मरण करता है—वह भक्त मृत्यु के समय योगबल द्वारा प्राणों को दोनों भौंहों के बीच (आज्ञा चक्र) में अच्छी तरह स्थापित करके निश्चल मन से उस दिव्य पुरुष को ही प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक मर्म: यहाँ 'ध्यान' की तकनीक बताई गई है। योगी अपनी पूरी जीवन-ऊर्जा को समेटकर आज्ञा चक्र (तीसरी आँख) पर ले आता है। जब मन सूर्य के समान तेजस्वी परमात्मा में लीन होता है, तो वह अंधकार (मृत्यु के भय) को पार कर जाता है।