॥ अध्याय 9, श्लोक 11-12 ॥

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ 11 ॥
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ 12 ॥

धार्मिक व्याख्या

कृष्ण कहते हैं: मेरे परम भाव को न जानने वाले मूर्ख लोग मुझे मनुष्य शरीर के आश्रित जानकर मेरा तिरस्कार करते हैं, जबकि मैं समस्त भूतों का महान ईश्वर हूँ। ऐसे भ्रमित लोग व्यर्थ की आशा, व्यर्थ के कर्म और व्यर्थ के ज्ञान वाले होते हैं, और वे राक्षसी व आसुरी स्वभाव को धारण किए रहते हैं।

आध्यात्मिक मर्म: लोग कृष्ण को केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति या साधारण इंसान मान लेते हैं। वे उस 'चेतना' को नहीं देख पाते जो उस शरीर के माध्यम से बोल रही है। जब दृष्टि केवल बाहरी आवरण पर होती है, तो इंसान सत्य से चूक जाता है।

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