महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ 13 ॥
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ 14 ॥
कृष्ण कहते हैं: परंतु हे पार्थ! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा जन मुझे सब भूतों का आदि और अविनाशी जानकर अनन्य मन से भजते हैं। वे निरंतर मेरे गुणों का कीर्तन करते हुए, यत्न करते हुए और मुझे नमस्कार करते हुए नित्य भाव से मेरी उपासना करते हैं।
आध्यात्मिक मर्म: महात्मा वह है जिसका मन कहीं और नहीं भटकता। जैसे एक सच्चा विद्यार्थी (जैसे आप IIT-Bombay के लिए) सोते-जागते अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहता है, वैसे ही महात्मा के हर कार्य में ईश्वर की स्मृति बनी रहती है।