ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ 9.15 ॥
कृष्ण कहते हैं: दूसरे कई लोग ज्ञान-यज्ञ के द्वारा मेरी उपासना करते हैं। कुछ मुझे अद्वैत (एकत्व) भाव से, कुछ पृथक (सेवक-स्वामी) भाव से और कुछ मेरे विश्वरूप की अनेक प्रकार से पूजा करते हैं।
आध्यात्मिक मर्म: ईश्वर तक पहुँचने के कई रास्ते हैं। कोई उन्हें अपने भीतर देखता है, कोई उन्हें मूर्ति में देखता है, तो कोई पूरी प्रकृति को ही ईश्वर मानता है। कृष्ण सबको स्वीकार करते हैं क्योंकि अंततः सब उन्हीं की ओर आ रहे हैं।