अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ 9.16 ॥
कृष्ण कहते हैं: क्रतु (वैदिक कर्म) मैं हूँ; यज्ञ मैं हूँ; स्वधा (पितरों को दिया जाने वाला अन्न) मैं हूँ; औषधि मैं हूँ; मंत्र मैं हूँ; घृत (घी) मैं हूँ; अग्नि मैं हूँ और हवन करने की क्रिया (हुतम्) भी मैं ही हूँ।
आध्यात्मिक मर्म: कृष्ण यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि धार्मिक अनुष्ठान के दौरान उपयोग होने वाली हर सामग्री और स्वयं वह प्रक्रिया भी परमात्मा का ही विस्तार है। जब साधक यह देख लेता है कि 'हवन करने वाला' और 'हवन की अग्नि' दोनों एक ही शक्ति के रूप हैं, तो वह द्वैत से मुक्त हो जाता है।