राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ 9.2 ॥
कृष्ण कहते हैं: यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा (राजविद्या) और सब गोपनीयों का राजा (राजगुह्य) है। यह परम पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फल देने वाला, धर्मयुक्त, अविनाशी और करने में बहुत सुखद है।
आध्यात्मिक मर्म: यह ज्ञान बोझ नहीं है। इसे अपनाना 'सुसुखं' (Very Joyful) है। जैसे आईआईटी की पढ़ाई कठिन लग सकती है, पर जब विषय समझ आने लगे तो वह आनंददायक हो जाती है, वैसे ही यह आत्मज्ञान जीवन को उत्सव बना देता है।