त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते... (20)
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ 21 ॥
कृष्ण कहते हैं: तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मों को करने वाले, सोमपान करने वाले पाप रहित पुरुष मुझे यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्रार्थना करते हैं। वे अपने पुण्यों के फलस्वरुप इंद्रलोक को प्राप्त होकर देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं। परंतु, उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्य क्षीण होने पर वे पुनः मर्त्यलोक (मृत्युलोक) में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार भोगों की कामना करने वाले लोग बार-बार आने-जाने (जन्म-मृत्यु) को प्राप्त होते हैं।
आध्यात्मिक मर्म: स्वर्ग एक 'हॉलिडे रिज़ॉर्ट' की तरह है। जब तक आपके पास 'पुण्य' का बैलेंस है, आप वहाँ रह सकते हैं। बैलेंस खत्म होते ही आपको वापस इस संसार में आना पड़ता है। कृष्ण यहाँ चेतावनी दे रहे हैं कि केवल इच्छाओं की पूर्ति के लिए धर्म का पालन करना आपको मुक्ति नहीं दिला सकता।