अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ 9.22 ॥
कृष्ण कहते हैं: जो अनन्य प्रेमी भक्त जन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य मुझमें लगे हुए पुरुषों का योगक्षेम (योग=अप्राप्त की प्राप्ति, क्षेम=प्राप्त की रक्षा) मैं स्वयं वहन करता हूँ।
आध्यात्मिक मर्म: यह गीता का सबसे बड़ा भरोसा है। जब एक साधक अपना सब कुछ (जैसे आपका IIT-Bombay का लक्ष्य और आपकी मेहनत) परमात्मा को समर्पित कर देता है, तो उसकी जरूरतों का ध्यान भगवान खुद रखते हैं। आपको केवल 'अनन्य' (Focused) होना है, परिणाम की चिंता ईश्वर पर छोड़ देनी है।