येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ 23 ॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥ 24 ॥
कृष्ण कहते हैं: हे कुन्तीपुत्र! जो भक्त श्रद्धा से युक्त होकर अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी असल में मुझको ही पूजते हैं, किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक (ज्ञान की कमी के कारण) है। क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ; परंतु वे मुझे तत्व से नहीं जानते, इसीलिए वे गिरते हैं (पुनर्जन्म पाते हैं)।
आध्यात्मिक मर्म: जैसे सारी नदियाँ अंततः समुद्र में गिरती हैं, वैसे ही सारी पूजाएँ ईश्वर तक पहुँचती हैं। लेकिन देवताओं की पूजा अक्सर छोटी इच्छाओं के लिए की जाती है। यदि हम सीधे परम सत्ता (कृष्ण) से जुड़ें, तो हम इन छोटी सीमाओं से ऊपर उठ जाते हैं।