शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ 9.28 ॥
कृष्ण कहते हैं: इस प्रकार (सब कुछ मुझे अर्पण करके) तू शुभ और अशुभ फलों वाले कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाएगा। संन्यासयोग में स्थित मन वाला तू विमुक्त होकर मुझे ही प्राप्त होगा।
आध्यात्मिक मर्म: जब हम कर्म को भगवान को सौंप देते हैं, तो उस कर्म का परिणाम (अच्छा या बुरा) हमें नहीं चिपका पाता। यह मन की शांति का सबसे बड़ा सूत्र है।