समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ 9.29 ॥
कृष्ण कहते हैं: मैं सब भूतों में समान रूप से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय (दुश्मन) है और न प्रिय। परंतु जो भक्त प्रेम से मुझे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।
आध्यात्मिक मर्म: परमात्मा सूर्य की तरह है जो सबको बराबर रोशनी देता है। लेकिन जो खिड़की खोलता है (भक्ति करता है), उसी के कमरे में उजाला आता है। भगवान किसी का पक्ष नहीं लेते, भक्त ही अपनी प्रीति से भगवान को 'अपना' बना लेता है।