अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥ 9.3 ॥
कृष्ण कहते हैं: हे परंतप! जो मनुष्य इस धर्म में श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे प्राप्त न होकर मृत्यु रूपी संसार-चक्र में बार-बार भटकते रहते हैं।
आध्यात्मिक मर्म: श्रद्धा वह चाबी है जो ज्ञान के द्वार खोलती है। बिना श्रद्धा के मनुष्य सत्य के करीब खड़ा होकर भी उसे देख नहीं पाता और पुरानी आदतों व जन्म-मृत्यु के चक्र में फँसा रहता है।