अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ 9.30 ॥
कृष्ण कहते हैं: यदि कोई अत्यंत दुराचारी (पापी) भी अनन्य भाव से मुझे भजता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने सही निश्चय कर लिया है।
आध्यात्मिक मर्म: यह आशा की सबसे बड़ी किरण है। भगवान अतीत को नहीं, वर्तमान के संकल्प को देखते हैं। एक बार जब कोई सही रास्ते (ईश्वर की ओर) मुड़ जाता है, तो उसकी पुरानी गलतियां उसे नहीं रोक पातीं।